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Kusum Paliwal

संवारी कुछ जिन्दगी

मैं कुसुम पालीवाल, उदयपुर की एक आम लड़की। जी हाँ लड़की वो भी तीन भाई बहन के बाद पैदा होने वाली अवांछित लड़की। समाज के कारण जन्मदाता द्वारा की गई एक कोशिश ,की पैदा होने से पहले ही कर दिया जाए खत्म। परन्तु भगवान के आगे कहाँ आज तक किसी की चली। पैदा तो होना ही था। पैदा होने के बाद परवरिश में कभी कोई कमी है वही लाड वही दुलार जो सभी को मिला था। तब बातों ही बातों में पता चला ये सब हाँ दुख हुआ लेकिन अच्छी बात ये थी कि प्यार सबसे ज्यादा मिला। सामान्य आर्थिक स्थिति में भी सभी को छोड़कर मेरी हर ख्वाहिश को पूरा किया। कॉलेज तक आते-आते मानो कही एक सपना बन गया हो की सामाजिक सेवा में जो सुकून है वो कही नहीं। पढ़ाई पूरी होने के बाद एक ऐसे इंसान से मिली जो मेरे लिए मेरी प्रेरणा बनी। जो मेरी कॉलेज की टीचर ही थी। उनके साथ काम करने का मौका चाहिए था और शायद भगवान भी यही चाहते थे।

तभी से हुई मेरे काम की शुरुआत। एक लड़की जो अन्तर्मुखी लड़की जिसे अब बहिर्मुखी बनाना था। कुछ सपने जो पूरे करने थे। बच्चों से प्यार इतना था कि पूरे दिन बच्चों के साथ रहने को कहो तो वो भी कर लूँ इसलिए काम भी बच्चों का ही चुना। काम भी ऐसा मिला जो पहली बार राजस्थान में शुरू होने वाला था ऐसे बच्चे जिनके माता पिता अपने बच्चों को रखने में सक्षम नहीं है उन्हें नये परिवार से जोडना।

काम तो बहुत नया था लेकिन कही ना कही मुझसे जूडा था। तब मैंने सोचा कि अगर मेरे मम्मी पापा मुझे नहीं रखते तो शायद मेरे लिए कोई और काम करा होता या मेरे लिए कोई नया परिवार ढूँढ रहा होता। तभी से मैंने ऐसे बच्चों के लिए काम करना शुरू किया। आज बच्चों के साथ उनके संरक्षण पर काम करते हुए मुझे 7 वर्ष हो गए। मुझे अपने काम पर गर्व महसूस होता है। एक बच्चे की बेजान जिन्दगी में परिवार का रंग भरना मेरे लिए आत्मा की संतुष्टि थी लेकिन आज मैंने 18 बच्चों की जिन्दगी को संवारा है। और मेरे मम्मी पापा के साथ मेरे भाई बहन भी मुझ पर गर्व करते है। यह सब काम जिस सोसायटी में रहकर कर पाई हूँ वह है फोस्टर केयर सोसायटी।

मेरा काम ही मेरी प्रेरणा है। 

Kusum Paliwal's Interview