Trilok Singh With his patented bicycles

त्रिलोक सिंह

एक इन्वेन्टरप्रेनयोर 

त्रिलोक सिंह : एक इन्वेन्टरप्रेन्योर

नमस्कार ज़िद्दी साथियों !

विचारों की मौलिकता, महान लोगों  को दुनिया से अलग बनाती है। अल्बर्ट आइंस्टीन ,पाब्लो पिकासो से त्रिलोक सिंह  तक, उनके विचारों में विशिष्टता ही है जो उन्हें ‘कल्पना से परे ’बनाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनमें एक और चीज समान है। क्या  ?

 वो है ज़िद |  यह लोग उन अद्वितीय विचारों को लेकर जीवन भर लड़ते रहे,  जिन्हें दुनिया मूर्ख समझती थी । और ऐसा कोई सामान्य व्यक्ति नहीं  एक ज़िद्दी योद्धा  ही कर सकता है | 

आज, हमारे पास एक ऐसे ही  “जिद्दी जीनियस” की कहानी है। द सेफ ज़ोन के संस्थापक , त्रिलोक सिंह । छोटे छोटे  विज्ञान परीक्षणों से लेकर  के अपने नाम पर पेटेंट प्राप्त करने तक, त्रिलोक ने एक अविष्कारक के रूप में लम्बा सफ़र तय किया  । फिर उद्यमशीलता की राह पर चलते हुए वह भारत के महान इन्वेंटोरप्रेन्योरों में से एक  बन गए।

तो चलिए जानते हैं त्रिलोक के इस सफ़र की दास्तां  ।

किताबो से जंग के ज़माने

त्रिलोक सिंह स्कूल में लास्ट बेन्चर थे । वो  एक ऐसे छात्र थे जिसकी कॉपीयां तो खाली रहती  पर दिमाग नए नए ख्यालों से भरा होता  ।

एक तरफ, त्रिलोक स्कूल में अपनी पुस्तकों के साथ संघर्ष करते । दूसरी ओर, उन्होंने अपने इलाके में कार्यशालाओं के माध्यम से 10 साल की उम्र में वेल्डिंग जैसे कौशल सीख लिए थे । उनके ये कौशल उनके बनाये मॉडल्स और प्रोजेक्ट्स में साफ़ नज़र आते थे ।

5 वीं कक्षा में, उन्होंने एक डेस्कटॉप कंप्यूटर की एक कार्डबोर्ड नक़ल बनाई, जो हुबहू असली की तरह दिखती थी। 7 वीं कक्षा में, त्रिलोक ने वाष्पीकरण की सरल प्रक्रिया का उपयोग करते हुए, एक लकड़ी के वॉटर हीटर को वाटर प्यूरीफायर  में बदल दिया।

इसके अलावा, उन्होंने अपने स्कूल के बारे में ‘ क्लासरूम टाइम्स ‘ नाम से एक छोटा अखबार प्रकाशित करना शुरू किया। उन्होंने स्कूल में चल रही सभी गपशप, लड़ाई और प्रेम कहानियों के बारे में लिखा।

क्या आपको नहीं लगता कि 12साल की उम्र के लिए यह एक अद्भुत विचार है? लेकिन हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसा नहीं सोचती। अपने कम नंबरों और अधूरे नोटबुक्स के कारण उन्हें हमेशा आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

यह केवल त्रिलोक के साथ नहीं हुआ , हमारी शिक्षा प्रणाली हर छात्र के साथ ऐसा करती है, जो तथाकथित ‘अध्ययन’ में अच्छा नहीं है। जिनमें से अधिकांश इस बोझ के तले दबते चले जाते हैं, लेकिन त्रिलोक एक योद्धा थे वो जंग लड़ने के लिये तैयार थे ।

9 वीं में, उन्होंने एक रिजनरेटिव साइकिल बनाने की सोची  ( जब आप पैडल करते हैं, यह एक बैटरी चार्ज करती है और फिर उस बैटरी पर चलती  हैं)। 2009 में  यह विचार अपने समय से कई आगे था। जब उन्होंने इसके  बारे में अपने शिक्षक से पूछा। उनके शिक्षक ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा  “तुम  तो अपनी नोटबुक भी पूरी नहीं कर सकते और तुम  क्या  आविष्कार करोगे ।”

त्रिलोक ने किसी तरह 10 वीं पास की। उनके स्कूल ने ख़ुशी से उन्हें विदाई दी, क्योंकि वे एक नए स्कूल में जाना चाहते थे। त्रिलोक विज्ञान पढ़ना चाहते थे  लेकिन उनके कम परसेंटेज ने उन्हें रोक दिया । अंततः  उन्हें वाणिज्य के साथ समझौता करना पड़ा।

एक लंबे साल के लिए, वह इसके साथ संघर्ष करते रहे  लेकिन असफल रहे । एक बार, उनके स्कूल के प्रिंसिपल ने उन्हें डांटा। उन्होंने एक पॉलिटेक्निक कॉलेज में प्रवेश लेने की बात कहकर त्रिलोक को अपमानित करने भी किया ।

त्रिलोक का अपमान करने के लिए बोले गये इस  वाक्य ने ,त्रिलोक की जिंदगी बदल दी । उन्होंने एक पॉलिटेक्निक कॉलेज में प्रवेश लिया जो उनकी रचनाओं का स्वर्ग बन गया।

Carboard Computer Made by Trilok Singh

पॉलिटेक्निक : त्रिलोक सिंह के आविष्कारों की दुनिया

पॉलिटेक्निक में आने के बाद त्रिलोक, स्कूल प्रणाली के बनाए विचारों की जेल से आज़ाद हो चुके थे । यहाँ अधिकांश विषय प्रैक्टिकल  थे।विचारों की स्वतंत्रता वाला ये लोक, त्रिलोक के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं था। इस स्वतंत्रता ने त्रिलोक की रचनात्मकता को और अधिक निखरने का अवसर दिया ।

अपने पहले वर्ष में, उन्होंने रिजनरेटिव  साइकिल के अपने विचार पर काम किया। वह एक प्रोटोटाइप बनाने में सफल रहे। सबसे पहले उन्होंने अपना आविष्कार किसको दिखाया? जाहिर है उनके शिक्षक, को जिन्होंने  उनका मज़ाक उड़ाया था। जब त्रिलोक ने अपनी इन्वेंशन उन्हें दिखाई , तो उन्होंने कहा “मुझे पता था, तुम  कर दिखाओगे “। इसलिए कहते हैं ”उगते सूरज को सब नमस्कार करतें हैं | ” …

“पॉलिटेक्निक को काफी कम आंका जाता  है। उस परिसर में तकनीकी ज्ञान बहता है, स्पंज की भाँति सोखने का  गुण आपमें होना चाहिए  ” त्रिलोक सिंह दावा करते  हैं ।

एक टी.वी. शो से उन्हें चॉपर बाइक के बारे में पता चला। उनके दिमाग में एक शानदार विचार आया, “क्या होगा अगर हम एक चॉपर साइकिल बनाते हैं”। अपने इस आइडिया पर काम करने के लिए , त्रिलोक ने अपने पिता की उपहार में दी साइकिल को दो हिस्सों में काट दिया।

“साइकिल बनाने के बाद, मेरी तस्वीर स्थानीय अखबारों के पहले पन्ने पर आने लगी। लोगों ने मेरे और मेरी बाइक के साथ तस्वीरें लीं। मुझे एक सेलिब्रिटी  की तरह महसूस हुआ। ”  त्रिलोक सिंह खुश होते हुए बताते हैं।

यह सफलता उनके लिए एक  प्रेरक प्रसंग बन गया और इसके बाद  त्रिलोक सिंह ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसके बाद, उन्होंने बीएसए साइकिल फैक्टरी, लुधियाना में इंटर्नशिप की। एक महीने में, उन्होंने साइकिल बनाने का  सही तरीका समझ लिया । फिर उन्होंने इस नए ज्ञान के साथ एक परफेक्ट चॉपर साइकिल बनाई, जिसे बाद में पेटेंट भी कराया।

फिर त्रिलोक को पीएचडी छात्रों और प्रोफेसरों से उनके लिए प्रोजेक्ट बनाने के लिए ऑफर मिलने लगे। उन्होंने  कुछआश्चर्यजनक चीजें बनाईं। उदाहरण के लिए, एक रिमोट कंट्रोल पटाखे जलाने वाला उपकरण , एक फल तोड़ने की मशीन  और कई और।

हालाँकि, उन्हें कभी भी इन आविष्कारों का श्रेय नहीं दिया गया, लेकिन इन पर काम करते हुए उनकी प्रतिभा का विकास  हुआ। जिसने उन्हें  कई और ऐसे आविष्कार करने की प्रेरणा दी | 

एक जीवन बदल देने वाली दुर्घटना

2013 में, त्रिलोक की  पॉलिटेक्निक की  पढ़ाई भी पूरी नहीं हुयी थी , जब उन्हें बीएसए मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में नौकरी का ऑफर आया । उसके बाद डेढ़ साल के अंतराल में त्रिलोक ने तीन अलग-अलग काम किए। एक साइकिल निर्माण में, फिर मर्सिडीज बेंज के साथ और अंततः बोश के साथ।

त्रिलोक कभी नौकरियों के लिए बने ही नहीं थे | उन्होंने  ये काम  सिर्फ अपने आविष्कारों के लिए आवश्यक अनुभव और उपकरण प्राप्त करने मात्र  के लिए किये । त्रिलोक नए अविष्कारों और प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ने लगे थे लेकिन शायद नियति को ये मंज़ूर नहीं था ।

7 अगस्त 2014 को, त्रिलोक को एक जानलेवा दुर्घटना का सामना करना पड़ा। वह इतनी बुरी तरह घायल हो गए थे  कि उन्हें  एक साल के लिए बिस्तर पर आराम करने  की सलाह दी गई थी। लेकिन सलाह मानकर कौन जिद्दी योद्धा बन पाया है ? त्रिलोक इतने सक्रिय प्रवर्ती के थे की बिस्तर पर बैठे रहना भला उन्हें कैसे गवारा होता  ।

उन्होंने एक विंटेज मर्सिडीज खरीदी थी, जिसके कुछ पार्ट्स  उन्होंने बेंज में काम करते हुए हासिल किए थे । वह उसे मॉडिफाई  करना चाहते थे लेकिन यह दुर्घटना हो गई। फिर भी वे कहाँ रुकने वाले थे । घावों के साथ, और अपने पेट से लटकते पाइपों के साथ, त्रिलोक ने उस मर्सिडीज को अपने हाथों से मॉडिफाई  किया।

इस तरह की एक कठिन घटना से उबरने के दौरान, त्रिलोक के उद्यमी मस्तिष्क में एक विचार ने दस्तक दी । उन्होंने अपने हाथ पैर तुड़वाकर ,  सुरक्षा गियर के महत्व को समझा। यह विचार त्रिलोक के सफल स्टार्टअप ‘द सेफ जोन ’ का पहला बीज बना ।

Vintage Mercedes Trilok bought
Mercedes after Trilok's Magic

एक इन्वेन्टरप्रेन्योर बनने का सफ़र

त्रिलोक एक बेहतरीन कॉलेज जीवन जीना चाहते थे । इसलिए उन्होंने एक  इंजीनियरिंग कोर्स में दाखिला लेने का फैसला किया । हालाँकि, उनके ग्रेडस  ने उन्हें कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश नहीं लेने दिया, लेकिन अंततः उन्हें एक ऐसा विश्वविद्यालय मिला, जहाँ  कागजों से अधिक कौशल को महत्व दिया जाता  था।

उन्होंने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। शुरुआत से ही, उन्होंने अपने उद्यमशीलता और इंजीनियरिंग कौशल का प्रदर्शन किया। जो कंपनियां विश्वविद्यालय के प्रबंधन से सीधे मुँह बात भी नहीं करती थी , वे त्रिलोक के हुनर का  सम्मान करती थी । क्योंकि उन्होंने अपने अद्भुत डिज़ाइन और प्रोटोटाइप से कई लोगों के दिल जीते थे ।

“कॉलेज एक ऐसी जगह है जहाँ आप अपने करियर की नींव रखते हैं। आपको तीन चीज़े करनी होती हैं एक्स्प्लोर , एक्स्प्लोर और एक्स्प्लोर। बाजारों को देखिये , औद्योगिक अनुभव प्राप्त कीजिये और नए कनेक्शन बनाइए । साथ ही, मज़े कीजिये, क्यूंकि वो समय  वापस लौट कर नहीं आता ।” हमारे जुनूनी आविष्कारक, त्रिलोक सिंह सलाह के तौर पर बताते  हैं | 

त्रिलोक अपने आविष्कारों में इतने तल्लीन थे कि उन्हें उनके बारे में सपने आने लगे थे  थे। उनके पेटेंट में से एक, सिंगल फ्रेम साइकिल की उत्पत्ति उनके एक रात के सपने से हुई थी। उन्होंने इस सपने को हकीक़त में बदला और सिंगल फ्रेम साइकिल बनाई। उनके निर्मित मॉडल वास्तव में उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग किए गए थे | सभी लोगों को उनकी ये साइकिल बहुत पसंद भी आई ।

अपने कॉलेज के चार वर्षों में, उन्होंने कई सहयोगियों को विभिन्न कंपनियों में नौकरी दिलाने  में मदद की, केवल उनके कनेक्शन के कारण। लेकिन त्रिलोक खुद कभी नौकरियों के लिए नहीं बने थे , उसकी नज़ारे हमेशा अपने बिज़नेस  पर ही टिकी थीं।

द सेफ जोन : क्यूंकि सुरक्षा ज़रूरी है

त्रिलोक ने अपनी खुद की हड्डियाँ तुड़वाकर  सेफ्टी गियर के मूल्य को समझा था। यह सबक सेफ जोन  की नींव बन गया।

सेफ ज़ोन एक ऐसी जगह है जहाँ गुणवत्ता सुनिश्चित और सुरक्षा मानक को पूरा करती  टू व्हीलर एक्सेसरीज़ ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफ़लाइन मोड में भी उपलब्ध हैं।

क्वालिटी एश्योरड राइडिंग गियर का बाज़ार भारत में लगभग  खाली था। त्रिलोक ने इस पर पूंजी लगाई और 12 लाख के निवेश के साथ, वे  2000  ऐसे प्रोडक्ट्स लाए, जो जीवन रक्षक की तरह राइडर्स के साथ रहें ।

“सेफ जोन के साथ, मैं असफल होने के लिए भी मानसिक रूप से तैयार था। क्योंकि मुझे पता है कि विफलता ही एक ऐसी चीज है जो मुझे सफल होने में सक्षम बना सकती है। यहां तक ​​कि अगर मैं असफल रहा, तो मैं एक व्यापारिक समझदारी हासिल करूँगा, जो कि एक एमबीए को 30-35 लाख रुपये खर्च करने के बाद मिलती है, इस तरह अगर देखा जाये तो  मुझे अभी भी 18-23 लाख का मुनाफ़ा  ही है । ”  त्रिलोक हँसते हुए  साझा करते  है।

त्रिलोक के शानदार तरीको  रचनात्मक कार्य और कस्टमर फ्रेंडली योजनाओं ने उन्हें इस बाज़ार में अच्छी तरह से स्थापित कर दिया । अब वह बाइक मॉडिफिकेशन में भी काम कर रहें  है।

उन्होंने अपनी बेजोड़ रचनात्मकता से अपने ग्राहकों का दिल जीत लिया है। त्रिलोक का बाइक मॉडिफिकेशन दा विंची की मोनालिसा से कम नहीं है। इसीलिए अगर आप अपनी बाइक पर त्रिलोक का जादू चलवाना  चाहते हैं, तो आपको एक अपॉइंटमेंट के लिए महीनों इंतजार करना होगा।

इसके साथ साथ , त्रिलोक GEARR Tech.( Golden Eye automotive Research and restoration technologies) नमक स्टार्टअप भी चलते हैं |  त्रिलोक और उनकी टीम भवन निर्माण कार्यों  को करने के तरीके को पूरी तरह से बदलने वाले  है। यह आविष्कार कई लोगों के होश उड़ा देने वाला है । इसलिए इसे अभी के लिए एक सरप्राइज ही बनाए रखते हैं।

कुल मिलाकर, त्रिलोक अपने जीवन को एक के बाद एक इनोवेशन करते हुए जी रहें हैं ।

त्रिलोक सिंह का संदेश

“जो लोग असफल होने से डरते हैं , वहीं अंत में बिना कुछ किये ही हार जाते हैं | लेकिन वे ये नहीं समझते की अकल बादाम खाने से नहीं ठोकर खाने से आती है | इसलिए उठिए हजारों गलतियाँ कीजिए, सफलता का रास्ता आपकी इन्हीं गलतियों की घाटियों में मिलेगा |  ”  

तो दोस्तों ये थी हमारे देश के जुगाड़ी इंजीनियर, त्रिलोक सिंह  की प्रेरक दास्ताँ | खाली कॉपीयों से इतिहास रचने तक, जुगाड़ी इंजीनियर से एक सफल उद्यमी बनने तक, उनकी  ज़िद ही तो थी जिसने  उन्हें भीड़ भरी दुनिया में स्वयं की पहचान दिलायी | उनकी अमूल्य रचनात्मकता  भी कहीं न कहीं खुद को साबित करने की ज़िद का ही नतीजा है और आख़िरकार आज उन्होंने खुद को साबित कर ही दिखाया  | 

तो क्यूँ न हम भी उनकी ही तरह अपनी गलतियों की घाटियों में सफ़लता के रास्तों को  खोजने  चले ? 

हम आपके लिए ऐसे कई ज़िद्दी योद्धाओं की की कहानियाँ लेकर आते रहेंगे | तब तक के लिए 

Stay Stubborn, Stay Passionate